“मन की शांति -सच्ची शांति नहीं “

मन से क्या मतलब है ? मन यानी की हमारा दिमाग या चित्त, इन सबको एक ही मान कर चलें | जो हमारे कण्ट्रोल में है उसे हमने बुद्धि का नाम दिया है और जो हमारे कण्ट्रोल में नहीं है उसे हमने मन का नाम दिया है | सब शब्दों का ही हेर फेर है क्यूंकि आखिर में सब हमारे मस्तिष्क (ब्रेन) की ही उपज है| अचेत मन / अनकंसियस माइंड या सचेत मन /कौन्सियसमाइंड – दोनों ही मस्तिष्क की अलग अलग अवस्था की दिखाते है |
सचेत मन जिसकी सहायता से हम लिख, बोल,पड़ और बाकी साड़ी एक्टिविटीज कर सकते है उसमें हेल्प करता है | और अचेत मन जो हमेशा काम करता है पर जब सचेत मन उसे ओवरटेक कर लेता है तो ये बैकग्राउंड में चला जाता है |
दोनों ही मस्तिष्क यानी दिमाग की ही उपज है|

मस्तिष्क यानी की ब्रेन, ये ऐवोलुशन की देन है| ऐवोलुशन की सीढ़ी में हमसे यानी मानव जाती से नीचे जो जानवर है उनके अंदर ब्रेन उतना डेवेलप नहीं है| सबसे ज्यादा डेवलप ब्रेन इंसान का है| हमारे ब्रेन का काम है- हमेशा सोचते रहना | सोचना यानी की चिंता का एक रूप और सोचने से कभी वास्तविक शांति नहीं मिल सकती| जिसका ब्रेन जितना ज्यादा डेवेलप है वो उतना ही अशांत और परेशान है|

अगर आस पास पशु पक्छियो को देखो तो वो कभी परेशान नहीं दिखेंगे | एक बिल्ली लगातार घंटो बैठकर अपने शिकार का इन्तजार करती है लेकिन वो कभी परेशान नहीं दिखेगी, वो कभी बोर नहीं दिखेगी |
इसके उल्टा अगर हमारे यहाँ दो मिनट नेट चला जाए या फिर टीवी देखते देखते जरा सा पावर कट हो जाए तो हम जरा सा पेशेंस नहीं रख सकते और कोसना चालु कर देते है| कुछ लोग तो गालियां निकालना तक चालु कर देते है | और अगर कुछ देर और तक बिजली या नेट नहीं आये तो टीवी या नेट का गुस्सा किसी और पर निकल जाता है| और फिर अगर नेट या टीवी वापिस आ जाए तो हमरा मन वापिस नेट या टीवी देखने में लग जाता है और हमें शांति का अनुभव होता है | लेकिन क्या ये शांति सच्ची शांति है ? नहीं ये वास्तविक शांति नहीं है| और इसका सबसे अच्छा एक्साम्पल यही है की अगर फिर से नेट या टीवी चला जाए तो ? ठीक ऐसा ही कुछ हमारे बचपन में हुआ है और जो लग भग हर एक की कहानी है | छोटे में जब हमसे कोई खिलौना छीन लेता है तो हम खूब रोते थे | उस खिलोने को ही अपना सब कुछ समझ लिया था| और आज यही खिलौना अलग अलग रूप बदल कर हमारे सामने आ रहा है – नेट, टीवी, फॅमिली, डिग्री ेट्स ेट्स | बचपन के खिलोने से खेलकर हम बड़े हो गए अब अगर कोई उस खिलोने को ले भी जाए तो फर्क नहीं पड़ता | लेकिन ये जो नए खिलोने ने उनकी जगह ले ली है उनसे पार पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन लगता है | जितना बड़ा खिलौना होगा जैसे घर या गर्लफ्रेंड/बॉयफ्रेंड, उसके खोने पर उतनी ही ज्यादा अशांति | यहाँ तक की लोग सुसाइड करके अपनी जान तक ले लेते है|

इसका मतलब ये नहीं है की हम सब जीना छोड़ दें बल्कि ये समझना है की वास्तविक शांति इन सब चीजों में नहीं है कही और है | और जब हम उस वास्तिवक शांति को प्राप्त कर लेते है तो इन सब चीजों को और ज्यादा एन्जॉय कर पाते है |

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“फिर मन को कैसे शांत करें”?

जैसा की पिछली पोस्ट में बताया की मन को शांत करने के लिए, किसी भी प्रकार का मन पर कण्ट्रोल या दबाव काम नहीं करेगा, तो यहाँ से इस बात को गाँठ बाँध ली जाए |

तो अगर कोई विधि काम न करे तो मन को कैसे शांत करें?
इसका जवाब ये है की मन को शांत करने की जररूरत ही नहीं है| और यही बात हमें कभी स्कूलों में बताई नहीं जाती, उल्टा हमें कुछ न कुछ करके मन को शांत करने को कहा जाता है | मन को शांत क्यों करना है ? मन का वास्तविक नेचर ही भटकने में है फिर उसे आप शांत करने क्यों चलें|

तो फिर मन क्या कभी शांत नहीं हो सकता?
ऐसा भी नहीं है| लेकिन जब आप ये बात जान लेते को मन का वास्तविक नेचर शांत रहना है ही नहीं तो अपने आप एक हलकी सी शांति आपको महसूस होती है| जिसे हम कहते आये है की- मन शांत हो गया| लेकिन ये शांति है ये आपके ‘मन’ से परे है, इसका ‘मन’ से कोई लेना देना नहीं है | जब हमने पहले ही ये गाँठ बांध ली की मन को शांत नहीं किया जा सकता तो फिर हम कैसे कह सकते है की -मन शांत हो गया| हाँ ये कहना ज्यादा सही होगा – अंदर शांति का अनुभव है| और ये शांति मन की शांति नहीं वरन मन से परे है|

आज इतना ही | धन्यवाद् |
सवालों के लिए बॉक्स में टाइप करें|

“मन को जितना शांत करने की कोशिश करोगे मन उतना ही भागेगा”

हम सबने हमेशा से सुन रखा की मन पर नियंत्रण करना बहुत कठिन है, और यही बात सच है की मन पर नियंत्रण कठिन है,बिलकुल है | कभी गौर किया की अगर नियंत्रण कठिन है तो कठिनता से किया काम शान्ति की तरफ कैसे ले जायेगा? लेकिन हम लोगों को हमेशा से यही सिखाया गया है -कण्ट्रोल करो,कण्ट्रोल करो| हम सबकी जिंदगी बीत जाएगी लेकिन वास्तविक शांति कण्ट्रोल कर कर के नहीं मिलेगी और यही सच है|

कण्ट्रोल करने का मतलब है मन को दबाना, सप्प्रेस करना| ऐसा करने से तो मन और अधिक विचलित होगा और वही होता है| गौर करने की बात ये है की जब हम ध्यान करने की कोशिश करते है और कोई बाहरी व्यक्ति हमें अकारण टोकता है तो तभी हमारा सबसे ज्यादा गुस्सा निकल जाता है| है न? उसका कारण यही है की मन को जितना टोकोगे ये उतना ही भागेगा |

तो एक बात तो पक्की हो गयी की मन को हम कण्ट्रोल कर कर के शांत नहीं कर सकते | और ये बात समझना ही शांति की तरफ बहुत महत्त्वपूर्ण कदम है| ये बात दिखने में छोटी लगती है और हम लोगों को बताई भी नहीं जाती लेकिन सच यही है की- “मन को जितना शांत करने की कोशिश करोगे मन उतना ही भागेगा” | जीतनी कोशिश करोगे उतना ही भागेगा|

तो फिर शांत कैसे करें? इसके लिए अगली बार लिखूंगा | और किसी का कोई सवाल हो तो कमेंट बॉक्स में लिखें| धन्यवाद